समाचार क्रमांक 01
चैत नवरात्र में मूलनिवासी आदिवासी समाज ने नौ दिनों तक किया प्रकृति पूजा,सामूहिक भोज व भंडारे के साथ हुआ कार्यक्रम का समापन।
भूपेंद्र लहरे
सक्ती / मूलनिवासी आदिवासी समाज के आस्था के केन्द्र बनते जा रहे बारगढ़ मालपानी देवस्थल में चैत्र नवरात्र पर्व पर मूलनिवासी समाज के लोगों ने नौ दिनों तक प्रकृति पूजन किया। इस महापर्व के अंतिम दिवस 29 मार्च, बुधवार को कार्यक्रम का समापन सामूहिक भोज के साथ प्राकृतिक अनुष्ठान के साथ सम्पन्न हुआ। इस संबंध में भूमका जय सिंह मरावी ने बनाया कि मूलनिवासी समाज नौ दिनों तक प्रकृति पूजन कर अपनी आदिवासी संस्कृति को बचाए रखने के साथ साथ उसे समृद्ध बनाएं रखने का संकल्प लेते हैं। भूमिका जय सिंह ने कहा कि यहां भूमि, आकाश, पानी, वायु तथा अग्नि के प्रतीक स्वरूप जोत जलाया जाता है। क्योंकि प्रकृति इन्हीं पांच तत्वों से संचालित है। आदिवासी नेता सरवन सिदार ने कहा कि प्रकृति की गोद में समाहित मालपानी के नाम से विख्यात यह मनोरम जगह आदिवासी समाज के आस्था का केंद्र है। जहां हमारा मूल निवासी समाज अपने हक अधिकार के प्रति जागरूक कर लोग अपनी आदिवासी परंपरा व संस्कृति को बचाए रखने का संकल्प लेते है। युवा आदिवासी नेता चंद्रशेखर व दिलचंद ने कहा आज हमें अपने आदिवासी संस्कृति को बचाए रखने के साथ साथ अपने समाज में जन्में महापुरुषों के त्याग व बलिदान को भी समझना है।
अंतिम दिन सामाजिक कार्यकर्ता उदय मधुकर व योम प्रकाश लहरे भी पहुंचे मालपानी।
वहीं मालपानी में चल रहे चैत्र नवरात्र पर्व के अंतिम दिवस सक्ती विधानसभा क्षेत्र के प्रसिद्ध समाजिक कार्यकर्ता व बहुजन समाज पार्टी के पार्टी प्रभारी उदय मधुकर भी मालपानी पहुंचे। जहां उनके साथ पत्रकार योम प्रकाश लहरे भी साथ रहे। इस मौके पर दोनों ने आदिवासी संस्कृति के मुताबिक उनके पारंपरिक वेशभूषा पहने विधि-विधान से पूजा अर्चना कर क्षेत्र वासियों के सुख शांति व समृद्धि के लिए कुदरत से प्रार्थना किया। इस संबंध में मूलनिवासी समाज के भूमका ओम प्रकाश मरावी ने बताया कि मालपानी में आदिवासी समाज द्वारा नवरात्र महापर्व एक दिन पहले शुरू होकर एक दिन पहले खत्म हो जाता है। इस लिहाज से 21मार्च से 29 मार्च तक चला। उन्होंने बताया कि मालपानी में साल 2003 से यहां आदिवासी समाज प्रकृति पूजा कर रहा है।
आयोजन को सफल बनाने इनका रहा योगदान
इधर नौ दिनों तक आयोजन को सफल बनाने में भूमका जयसिंह मरावी,दूजे नेताम, ओमप्रकाश मरावी,भोपाल सिंह मरावी, पीतांबर सिदार, पप्पू सिधार, नत्थू सिदार, परदेशी सिदार, अनुज सिदार, रोहित सिदार, दिल चंद, चंद्रशेखर, पवन सिदार, मोहन सिदार, रामकुमार, प्रभाव सिदार, खुशहाल सिदार सहित मूलनिवासी समाज के लोगों का अह्म योगदान रहा। इस आयोजन में सक्ती, खरसिया व रायगढ़, जशपुर, सरगुजा, भांठा पारा कोरबा सहित पूरे बिलासपुर संभाग भर से मूलनिवासी समाज के लोग शामिल हुए।


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