27 मई 2021

स्वास्थ्य, शिक्षा और संस्कार मेरे तो बस तीन मुद्दे है और आपका- लालू गबेल


 *स्वास्थ्य, शिक्षा और संस्कार मेरे तो बस तीन मुद्दे है और आपका- लालू गबेल*

कोरोना काल में सबको समझ आनी चाहिए मानव जीवन और व्यवस्था में ये तीन कमी।

*राजनीति की आपसी टकराहट में मूलभूत आवश्यकताओं को भूलते जा रहे नेतागण।*

इतिहास के इस सबसे बड़े वैश्विक महामारी में भी नही किसी को सुध।


सामाजिक कार्यकर्ता लालू गबेल ने एक बार फिर राजनेताओं का ध्यान आकृष्ट कराते हुए कहा कि जनता के लिए तो मेरे तीन मुद्दे है स्वास्थ्य, शिक्षा और संस्कार लेकिन आपका (नेताओं का) मुद्दा क्या है।

सामाजिक कार्यकर्ता लालू गबेल कहते है कि आज तक के इतिहास में इस धरती पर कोरोना महामारी जैसे कोई महामारी नही टिक पाया लेकिन क्या वजह है कि कोरोना महामारी की कहर पूरे ब्रम्हांड में काफी लंबे समय तक प्रबल है और होते जा रहा जिसका कोई तोड़ आज का आधुनिक विज्ञान भी नही निकाल पा रहा। जिस पर सामाजिक कार्यकर्ता लालू गबेल कहते है कि मेरा व्यक्तिगत सोच है कि  वर्तमान आधुनिक युग में मानवजीवन और उनके कार्यप्रणाली ही मुख्य वजह है, जिसमें सबसे बड़ा कारण है निजी स्वार्थ और टकराहट की राजनीति जो इस भयानक महामारी में भी मूलभूत मुद्दों से भटक कर पक्ष विपक्ष की राजनीति करते नजर आ रहे। वर्तमान जरूरतों को नजरअंदाज कर अपने राजनीति रोटी सेकने में लगे है। जबकि अभी सर्व राजनीतिक दलों के नेताओं को अपने सभी राजनीतिक मुद्दों को दरकिनार कर देश और देशवासियों को सुरक्षित रखने ध्यान देना चाहियें।

श्री गबेल ने कहा कि नेता अगर स्वास्थ्य, शिक्षा और संस्कार को लेकर काम किये होते तो आज माहौल कुछ और नजर आता।


अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं होती तो लोग सुरक्षित रहते लाखों परिवारों के घर बेघर होने से बच जाते हजारो लाखों बच्चे अनाथ नही होते परंतु इस पर शुरू से कोई ध्यान नही, सभी सरकारी अस्पतालों की स्थिति बद से बत्तर है और सुविधाओं पर भ्रष्टाचार चरम पर है। स्वास्थ्य के नाम पर अरबो खरबो रुपये बहाए जा रहे लेकिन जरूरत मंदो तक कोई सुविधा सही नही पहुँच रही, साथ ही गरीब तो निजी अस्पतालों के बारे में सोच भी नहीं सकते और जो निजी अस्पताल पहुँच जा रहे उनके तो लोटिया भी डूब जा रहें, ना जाने ऐसा क्या जादू है उपचार के निजी अस्पतालों के हाथों में जो शासन प्रशासन के बस में नही कोरोना का ईलाज कर पाना और निजी अस्पताल वाले एक एक इंजेक्शन 25-30-40-50 हजार के ठूस के मरीजो को ठीक कर रहे और लाखों का भुगतान ले रहे। नेताओं और अमीरों के परिवारों को तो निजी अस्पतालों में सारी सुविधाएं मिल जा रही लेकिन गरीब और मध्यम वर्गीय लोगों का क्या होगा कभी सोचते भी नही। 

वही बेहतर शिक्षा पर कोई जोर नही,आजादी के 74-75 साल गुजरने को है लेकिन हमारे शिक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत सबको पता है जहाँ नीचे से ऊपर तक भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती शिक्षा व्यवस्था पर कोई लगाम नही और ना ही कोई ठोस पहल की जा रही। आरक्षण, जाती, धर्म तक ही सिमटी हमारी शिक्षा व्यवस्था पर कभी कोई बेहतर शिक्षा से साथ काबिलियत, योग्यता, दक्षता पर जोर नही दिया। लोभलुभावन शिक्षा के योजनाओं तक गरीबों को सिमट दिया गया और योग्यता से काबिल बनाने के कोई प्रयास नही। और जो लाखों खर्च कर पढ़ लिख कर डिग्री ले रहे उनको निजीकरण से व्यवसाय करने फुर्सत नहीं। राजनैतिक लोग कभी परवाह भी नही करते कि गरीबों और मध्यम वर्गीय लोगो को अच्छी शिक्षा से काबिलियत हासिल हो, वो तो आरक्षण नही होता तो गरीब और मध्यम वर्गीय लोग न जाने और कितने नीचे स्तर में रहते। वर्तमान जरूरत को जो काबिलियत और योग्यता चाहिए वो हमारे शिक्षा पद्धति में कही नही। बहुत से लोग गरीब और माध्यम वर्गीय लोगो के आरक्षण को लेकर सवाल करते रहते है वो कभी ये क्यों नही सोचते कि हमारे शिक्षाप्रणाली की व्यवस्था ही सबके लिए इतनी बेहतर हो जाये कि किसी को आरक्षण की जरूरत ही ना पड़े, शिक्षा पर जो साधन सुविधा भारी भरकम खर्च में मिलते हो वो आसानी से सरकारी सिस्टम मे मिले। किसी को शौक नही जनाब की किसी के काबिलियत पर आरक्षण का मोहर लगे वो तो मजबूरी है अमीरी गरीबी के फासलों में जिसमे गरीब सरकारी व्यवस्थाओं तक निर्भर रहते है और सारी उच्चतम सुविधा निजीकरण और भारी भरकम खर्च से हासिल होता है। फिर भी वही लोग पूरे तंत्र को संभाल रखे है बाकी तो निजी व्यवसाय कर लूटने में मस्त है।

आज तक जितनी भी सरकारें सत्ता में आई है वे सभी निम्न और मध्यम वर्गीय लोगों के लिए केवल योजना बनाते है उनके लिए कोई ठोस नीति नही बनाते जो स्थायी हो और इन वर्ग के लोगो को एक निश्चित आय साधन प्राप्त हो सके।

सभी सरकारे सत्ता प्राप्ति के लिए केवल मुफ्त की योजना लाते है निम्न और मध्यम वर्गीय के लिए कोई व्यवसाय या काम धंधा मिल सके ऐसा कोई नीति भी नही बनाते । आजादी के सालों बाद सन 2005 में एक योजना बनाई गई है वह मनरेगा के नाम से जिसमे गरीब वर्ग को 100 दिन का कार्य दिया जाना है लेकिन जनप्रतिनिधियों के लापरवाही और प्रशानिक व्यवस्था में सही क्रियान्वयन नही होने से भष्ट्राचार का शिकार हो जा रहा हैं और तो और समय पर मजदूरी का भुगतान तक नही हो पाता है। तो कहा से निम्न व मध्यम वर्गीय लोग महंगे शिक्षा का सपना देख सकते है।

और बात करे संस्कार की तो, वो तो है ही नही कही, आज पढ़ लिख कर डिग्री तो ले ले रहे लेकिन पढ़ लिखकर योग्य कहलाने वाले लोग केवल अपने निजी स्वार्थ तक सीमित हो गए है, जैसे उनकी योग्यता और काबिलियत खुद के लिए हो, देश समाज और कर्तव्यों का कोई मोल नहीं। पढ़ लिख कर कलेक्टर, इंजीनियर, डॉक्टर आदि बन जा रहे लेकिन संस्कार इतना नही की देश व देश की लोगो के लिए सेवा और समर्पण का भाव हो। उसका कारण भी यही है कि हम सिस्टम में शुरू से स्वार्थ भ्रष्टाचार, अमानवीय विचार आदि आदि वही सब देखते सीखते आ रहे है। सिस्टम में हमे देश के प्रति समर्पण, समाज के प्रति सेवा, कर्तव्यों के प्रति ईमान कभी दिखाए और सिखाये नही जाते। नाममात्र के राजनैतिक और प्रशासनिक लोग है जो इन सब पर सोचते है जिनकी संख्या नही के समान है। जहाँ देश और समाज के प्रति संस्कार होता हैं वहाँ सारी बाधाएँ दूर हो जाती है। वर्तमान में स्वास्थ्य सेवा और शासनिक/प्रशासनिक सिस्टम में पूर्ण ईमानदारी के साथ सेवा और समर्पणभाव से कार्य चल रहा होता, सभी अपने मानवता धर्म का पालन कर रहे होते तो देश का दृश्य कुछ और होता। परन्तु अच्छे संस्कार भी नहीं के समान है।

अगर ये तीन कमी हमारे देश अंदर नही रहती तो भारत बहुत तेजी से संसार में विश्वगुरु की ओर इतिहास रच रहा होता।

सामाजिक कार्यकर्ता लालू गबेल ने सभी राजनैतिक दलों के नेताओं को अपील किया है कि राजनीति कुछ भी करें लेकिन सबको इन मुद्दों पर मिलकर जोर देना चाहियें ताकि देश और देशवासी सुरक्षित,शिक्षित और संस्कारित रहें। और ये तीनों कमी जिस दिन पूरी हो जायेगी उस दिन भारत विश्व गुरु कहलायेगा। इस कोरोना काल मैं मैंने यही कमी देखा क्या आपको दिख रहा।

मेरे तो बस तीन मुद्दे स्वास्थ्य,शिक्षा व संस्कार, और आपका- लालू गबेल


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