02 जून 2021

बेबस गरीब आदिवासियों की जीवन और मौत से जंग, एक ने जीता एक ने हारा - लालू गबेल


 बेबस गरीब आदिवासियों की जीवन और मौत से जंग, एक ने जीता एक ने हारा - लालू गबेल


जो जीता उसे सहारा मिला था, और जो हारा उसे किनारा तक नसीब नहीं हुआ था।

ना जाने ऐसे कितनो ने अपनी जान गवाँ दिए होंगे गैरजिम्मेदारी और लचर व्यवस्था के कारण।

*आइये जानते है कोरोना काल मे बेबस गरीबो की सच्ची कहानी, सामाजिक कार्यकर्ता लालू गबेल की जुबानी*


सामाजिक कार्यकर्ता लालू गबेल जो बताने जा रहे है वह कोरोना काल की सच्ची जमीनी हकीकत है।

सबसे पहले जानते है उस गरीब 50 वर्षीय आदिवासी देवारी लाल सिदार की बदकिस्मती पर जिसने शासन प्रशासन के लचर व्यवस्था के कारण मौत से जंग हार गया।

दिनाँक 14 मई की रात्रि 9.30 बजे की बात है जब सामाजिक कार्यकर्ता लालू गबेल के मोबाईल में फोन आता है मालखरौदा ब्लाक के नवरंगपुर सरपंच प्यारे लाल चौहान का और सरपंच बताते है कि हमारे गांव के देवारी लाल सिदार उम्र 50 वर्ष का अचानक तबियत बहुत खराब हो गया है जिसको सांस लेने में बहुत दिक्कत हो रही और जोर जोर से हकरा रहा है जिसको एम्बुलेंस108 में सक्ती के सरकारी हॉस्पिटल ले के जा रहे तबियत बहुत ही खराब है कुछ जरूरत पड़े इसलिए आप जगते रहना। श्री गबेल ने ठीक है कहा और कुछ देर बाद फिर सरपंच का फोन आया और बोले कि सक्ती में डाक्टर बोल रहे कि यहाँ तो ऑक्सीजन सुविधा नही और कोविड सेंटर जेठा में जगह नही ऑक्सीजन बेड नही है डाक्टर बाहर रिफर कर रहे लेकिन इसको तत्काल ऑक्सीजन और ईलाज चाहिए। तब(लालू गबेल) मैंने सरपंच को डयूटी में उपस्थित डाक्टर से बात कराने बोला और मैं डाक्टर से बहुत निवेदन किया लेकिन उन्होंने कहा कि ऑक्सीजन सुविधा नही है और इसकी हालात बहुत खराब है बोल के अपना हाथ खड़ा कर दिया। सरपंच और मैंने बहुत प्रयास किया लेकिन डाक्टर ने साफ साफ मना कर दिया और कोविड सेन्टर जेठा सक्ति में देवारी लाल सिदार को जगह नही मिला। तब आनन फानन में वही खड़ी उसी 108 एम्बुलेंस में पुनः नम्बर डायल कर देवारी लाल सिदार को जैसे तैसे जिला कोविड सेन्टर जांजगीर ले के गए जहां पुनः जगह नही की बात सुनकर वहाँ परिजन कोविड हॉस्पिटल डॉक्टर स्टाफ के सामने बहुत रोये गिड़गिड़ाए लेकिन वहा भी जगह नही है बोल के उसका कुछ भी ईलाज नही किये और न ही जिला के कोविड सेंटर में भर्ती किये। बेबस्ता उस गरीब परिवार के पास और कोई उपाय नही था 108 एम्बुलेंस तुरंत छोड़ के भाग चुका था जो बड़ी मुश्किल सक्ती से जांजगीर ले जाने तैयार हुआ था। गरीबी की लाचारी तो देखिए जैसे तैसे जांजगीर के एक निजी एम्बुलेंस ऑक्सीजन युक्त मोटी रकम देकर तैयार किये और उसी निजी एम्बुलेंस की ऑक्सीजन के सहारे वापस घर लौट गए जहाँ देवारी लाल सिदार जिंदगी से जंग हार गया। अगर वक्त पर उस गरीब आदिवासी देवारी लाल सिदार को ईलाज मिल जाता तो शायद आज वो जिंदा होते। उन गरीब परिवारों के बीवी बच्चों के ऊपर क्या बीती होगी जिनके सामने घर का मुख्या तड़फ रहा हो जिसको कही कोई सहारा ना मिले और बेबस्ता अपनो को तड़फ तड़फ के मरते देख रहे हो। 

अब बताइये जब बेचारे गरीब देवारी लाल सिदार की हालत नाजुक थी तो सक्ती हॉस्पिटल के ड्यूटीरत डॉक्टर और स्टाफ चाहते तो क्या तुरंत ऑक्सीजन और अन्य व्यवस्था नही हो सकता था जहाँ इतने सारे दानी धर्मात्मा बैठे जो कोरोना के लिए अन्य स्थानों को भी ऑक्सीजन से लेकर अन्य व्यवस्था त्वरित उपलब्ध करा रहे। अगर वहाँ मानवता रहती और लोगो में अपने कर्तव्यों के प्रति थोड़ा भी ध्यान रहेता तो शायद अधिकांश लोग आज भी हमारे बीच होते।

यह बात को नकारा नही जा सकता कि कोरोना के नाम पर अधिकांश मौते सिस्टम की लापरवाही, कमी और गैरजिम्मेदारना व्यवस्था से हुई है। जहाँ सबसे ज्यादा लोग भय से मरे जो हॉस्पिटल जाने के बाद मरीजो को दिया जाता है।

फिर बिना उचित जांच पड़ताल के आंख बन्दकर कोरोना का ईलाज और दवाई जिसमे अधिकांश लोग कोरोना के नाम गलत ईलाज और दवाई से मरे जिसमे सुगर बीपी वाले ज्यादा शामिल है।

तीसरा आम लोगो की नासमझी और लापरवाही। इस संबंध में व्यक्त करने के लिए मेरे पास छोटी शब्द नही और लिखने के लिए जगह नही।


वही एक दूसरे गरीब आदिवासी बुजुर्ग 65 वर्षीय बलदेव सिंह सिदार ग्राम रनपोटा (मालखरौदा) के संबंधित व्यक्ति रूप लाल साहू का दिनाँक 18 मई को दोपहर 2 बजे फोन आता है कि लालू भईया एक बुजुर्ग आदमी का बहुत तबियत खराब है जो आखरी स्थिति में है सांस लें नही पा रहा ऑक्सीजन लेवल काफी कम है डभरा से लेके आ रहा हूँ। मैंने कहा ठीक है सीधा कोविड सेन्टर पिहरीद ले जाना। मरीज के कोविड सेंटर पिहरीद पहुँचते ही डयूटीरत डाक्टर कोविड टेस्ट कराने कोविड टेस्ट सेंटर आई टी आई मालखरौदा भेज दिया। वहाँ से फिर रूप लाल साहू का फोन आता है कि लालू भईया इसका कोरोना टेस्ट कराने लाये है लेकिन इसका स्थिति एकदम आखरी है भईया। इतना सुनते ही मैंने कोविड सेन्टर में डयूटीरत डॉ मिथलेश चन्द्रा को फोनकर बोला कि इस बुजुर्ग मरीज को मुख्यालय के हॉस्पिटल में भर्ती करा दीजिये और जल्द से जल्द उपचार कराने निवेदन किया तो डॉक्टर चन्द्रा तुरंत तैयार हो गए और मुख्यालय के अस्पताल में डयूटीरत स्टाप को फोन कर भर्ती करने और उपचार करने बोले। इतने में मरीज के साथ साथ मैं भी अस्पताल पहुँच गया और बुजुर्ग बलदेव सिंह को बोला आप डरना मत आप ठीक हो जाएंगे। अस्पताल स्टाफ उनका पल्स नाप ही रहे थे उतने में डॉ मिथलेश चन्द्रा कोविड सेंटर पिहरीद से यहाँ पहुँच गए और तत्काल कुछ इंजेक्शन और दवाई दिए मैंने कहा डॉक्टर साहब कुछ दवाई बाहर के लायक होगा तो भी बताये मैं ले आऊंगा, तब डॉक्टर चन्द्रा ने कुछ दवाई इंजेक्शन लिख कर दिए जो मात्रा 248 रुपये का था जिसको तुरंत लेके आये और बुजुर्ग बलदेव सिंह सिदार का ईलाज शुरू हुआ। इसी कड़ी में उसे ऑक्सीजन की जरूरत पड़ी मैंने मालखरौदा हॉस्पिटल के सक्रिय स्टाफ राधेश्याम निराला को फोन किया जो तुरंत आये लेकिन ऑक्सीजन सिलेंडर था और फ्लोमिटर को कोविड सेंटर ले जाया जा चुका था। तब मैंने हमारी कोविड केयर कमेटी के पास रखे फ्लोमिटर को तत्काल लाया और बुजुर्ग बलदेव सिंह सिदार को ऑक्सीजन उपलब्ध कराया और बुजुर्ग बलदेव के स्वस्थ में काफी सुधार आ रहा था। लेकिन कुछ गैरजिम्मेदारो की हरकत भी देखिए कि मालखरौदा अस्पताल में डयूटीरत डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ अपने जिम्मेदारी से बचने के लिए उसी दिन देर रात को उस बुजुर्ग को बाहर रिफर कर रहे थे और उन्हें डराकर कर अस्पताल से भेज दिए जो रात को अपने घर लौट गए। लेकिन दिनाँक 23 मई को पुनः उस बुजुर्ग बलदेव सिदार का तबियत बहुत ज्यादा फिर खराब हो गया जिसको पुनः मालखरौदा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र लाये जहां से उन्हें बिना देखे ही भगा रहे थे। जिस पर सामाजिक कार्यकर्ता लालू गबेल बहुत आक्रोशित होकर डयूटीरत डॉक्टर और स्टाफ पर जमकर बरसे थे फिर बीएमओ को बुला कर बुजुर्ग बलदेव को जिद कर भर्ती कराये और उपचार हुआ। जिसके सप्ताह भर ईलाज के बाद पूरा स्वस्थ हो गया जो अंत से अंत समय मे मौत को मात दे दिया।

आगे सुनके आप चौक जायेंगे कि बलदेव सिंह सिदार के लिए परिजन उम्मीद छोड़ चुके क्योकि बलदेव सिंह सिदार पिछले दिनों से डभरा के जानेमाने डॉ एन पी मिश्रा के निजी क्लिनिक में भर्ती था जो खाना पीना छोड़ चुका और अंतिम सांस से वो भी हकरा रहा था, डॉ मिश्रा ने बुजुर्ग बलदेव के ईलाज के लिए असमर्थता जताते हुए बाहर ले जाने बोल के हाथ खड़ा कर दिया और बाहर भेज दिया।पंरतु बलदेव सिंह सिदार को मालखरौदा के सरकारी अस्पताल में सामाजिक कार्यकर्ता लालू गबेल के प्रयास और बीएमओ डॉ रविन्द्र सिदार, डॉ मिथलेश चन्द्रा, स्टाफ राधेश्याम निराला के सहयोग से जीवनदान मिला।

शायद इसी को कहते है डूबते को तिनके का सहारा।

अब आप सोचिये की मृतक गरीब आदिवासी देवारी लाल सिदार को अगर समय पर ईलाज मिल जाता तो बचता की नही, शायद हाँ ही बोलेंगे।

बस यही बेबसी और लाचारी है गरीबो की। और यही हाल है कोविड सेन्टरों का जहाँ समय पर सेवा सुविधा व ईलाज का आभाव है। ना जाने कितने गरीब और आम जनता इस तरह के गैरजिम्मेदारो की लापरवाही और सिस्टम में अव्यवस्था के कारण अपनी जान गवां रहे है जिनका कोई ध्यान देने वाले भी नही और ना ही लोग इसे समझने की कोशिश कर रहे।


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