15 फ़रवरी 2021

जीव व ब्रह्म को उदर में धारण करने वाली नारी परमसत्ता की अत्यंत समर्थ बाल व्यास ,कान्हा शास्त्री


 जीव व ब्रह्म को उदर में धारण करने वाली नारी परमसत्ता की अत्यंत समर्थ बाल व्यास ,कान्हा

शास्त्री




सिद्ध तंत्र पीठ भैरव बाबा मंदिर रतनपुर में गुप्त नवरात्र पर हरिवंश पुराण एवं श्रीमद्भागवत महापुराण का आयोजन वहीं चौथे दिन हरिवंश पुराण की कथा सुनाते हुए बाल व्यास कान्हा शास्त्री जी ने कहा - "त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं हि वष्‌टकारः स्वरात्मिका ..!" जीव व ब्रह्म को उदर में धारण करने वाली नारी परमसत्ता की अत्यंत समर्थ, कोमल व निर्दोष अभिव्यक्ति है। मंत्रदृष्टा ऋषिकाओं से लेकर आधुनिक भारत के सृजन में मातृ सत्ता का अतुलनीय योगदान है ...। जब भारतीय ऋषियों ने अथर्ववेद में ‘माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः’ (अर्थात्, भूमि मेरी माता है और हम इस धरा के पुत्र हैं।) की प्रतिष्ठा की तभी सम्पूर्ण विश्व में नारी-महिमा का उद्घोष हो गया था। नेपोलियन बोनापार्ट ने नारी की महत्ता को बताते हुए कहा था कि - ‘मुझे एक योग्य माता दे दो, मैं तुमको एक योग्य राष्ट्र दूंगा’। परिवार, समाज, राष्ट्र नारी की सहभागिता के बिना अपूर्ण है, माँ दुर्गा ने महिषासुर का वधकर अधर्म का नाश करके धर्म की संस्थापना कर सद्शक्तियों का संरक्षण व संगठन किया था। मातृशक्ति का भारतीय संस्कृति में सर्वोच्च महत्व है। जीवन का प्रवाह, हमारी प्राणशक्ति का स्रोत मातृशक्ति ही है। ब्रह्मांड के हर तत्व में निहित व हर तत्व की सृजनकर्ता मातृशक्ति ही है। इसलिए हिंदू धर्म के अनुसार मातृशक्ति को सच्चिदानन्दमय ब्रह्मस्वरूप भी कहा गया है। इसके बिना किसी भी ईश्वरीय तत्व का उद्भव ही संभव नहीं है। मातृशक्ति को आद्यशक्ति भी कहा गया है। माँ भगवती का हर स्वरूप अध्यात्म के मूल तत्वों - ज्ञान, सेवा, पराक्रम, समृद्धि, परमानन्द, त्याग, ध्यान और सृजन शक्ति का अवतरण है। मातृशक्ति के चार स्वरूप - गीता, गंगा, गायत्री और गौ माता हैं। पूज्य "आचार्यश्री" जी ने कहा - मनुष्य की कोई भी सोच जो समाज में भेद पैदा करे, मनुष्य को मनुष्य से दूर करे चाहे वह भाषावाद, प्रांतवाद और जातिवाद की ही बात क्यों न हो, उसे पनपने नहीं देना चाहिए। हम सभी आद्यशक्ति माँ भगवती की संतान हैं। हम सभी में एक ही चेतना है, एक ही प्राण हैं। हमारे किसी भी भेद से कष्ट माँ भगवती को ही होगा। ऐसा इसलिए, क्योंकि उसने हमें इस पावन धरा पर आपसी प्रेम व भाईचारे का अनुपम संदेश हर जगह फैलाने के लिए भेजा है। यही संगठन साधना है और राष्ट्र साधना है। मनुष्य को सही मायने में मनुष्य बनाने के लिए किया गया सर्वोत्तम प्रयास है। हम नव-ऊर्जा से परिपूरित होकर भारतीय जनमानस के लिए कुछ कर सकें तो समाज का कल्याण निश्चित है। माँ भगवती का दिव्य संदेश भी यही है ... वही हरिवंश पुराण की कथा प्रतिदिन श्रवण करने रेल परिवार से हरिओम दुबे पहुंचते हैं एवं अन्य श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या में उपस्थिति रहती है


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