22 मार्च 2020

रायपुर :-
इस वक्त की बड़ी खबर

*जनता कांग्रेस ( जोगी) के प्रदेश अध्यक्ष अमित जोगी जी का बड़ा बयान,*
*जनता कर्फ़्यू से बात नही बनने वाला ,कोरोना का एकमात्र उपाय आपातकाल क्यों है?*

‘जो इतिहास से सीख नहीं लेते हैं, वो उसे दोहराने के लिए श्रापित हैं’- जॉर्ज संतायना (1905)

कोरोना के पहले विश्व की सबसे बड़ी महामारी 1918-19 में ‘स्पैनिश इनफ्लूएंजा’ थी हालाँकि बेहतर होता कि इस  महामारी का नाम ‘इंडियन इनफ्लूएंजा’ रखा जाता क्योंकि पूरी दुनिया में इस से सबसे ज्यादा मौतें भारत में हुई थी। लगभग 1 करोड़ 80 लाख लोग- अर्थात् उस समय की भारत की 6% आबादी- स्पैनिश इनफ्लूएंजा से मारे गए थे। 100 साल बाद, भारत की स्थिति में कितना सुधार हुआ है, यह तो समय की गर्भ में ही है किंतु कोरोना की चुनौती का हम, एक राष्ट्र और एक समाज के रूप में, कैसे सामना करते हैं, इसका उत्तर न केवल हमारी 73 साल की आज़ादी की उपलब्धियों का सही और सटीक दर्पण होगा बल्कि देश के भविष्य की दिशा और दशा भी तय करेगा।

1918-19 का अगर इतिहास दोहराता है तो अगले 1 साल में 8 से 10 करोड़ भारतवासी कोरोना से मर सकते हैं।  जनता कर्फ़्यू से बात नहीं बनने वाली है। अब केंद्र सरकार को भारत के संविधान के अनुछेद 352 का प्रयोग करते हुए आपातकाल (इमर्जन्सी) लागू कर देना चाहिए। अपनी इस बात के समर्थन में मैं 5 बेहद चिंताजनक तथ्य रखूँगा:

जाँच की साँच
1. भारत में अब तक करीब 15,000 लोगों की ही करोना की जांच हो पाई है जबकि हम से कई गुना छोटे साउथ कोरिया राष्ट्र में 2,70,000 लोगो की जांच हो चुकी है। ICMR द्वारा निर्धारित जांच-प्रोटोकाल के अनुसार केवल विदेशी मूल के प्रकरणों की जांच पर जोर दिया जा रहा है, इसलिए स्वभाविक रुप से ऐसे ही लोग पाजिटिव मिल रहे हैं जिन्होंने हाल-फ़िलहाल में विदेश यात्रा करी है। इस प्रकार की बेहद सीमित और सिलेक्टेड जाँच के कारण प्रिन्स्टन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक रामानंद लक्ष्मीनारायण का मानना है कि अगर भारत में 20 गुना अधिक जांच होती, तो 20 गुना अधिक लोग संक्रमित पाए जाते।

गर्मी पे न इतना गुमान कर
2. भारत की अंतरराष्ट्रीय सीमा के अंदर कोरोना संक्रमण इटली से 30 दिन बाद और अमेरिका से 2 हफ्ते बाद घुसा है। भारत में इन दोनों देशों से कुछ अलग होगा, ऐसा सोचना ग़लत है, ख़ासकर जब ये सिद्ध हो चुका है कि गर्मी या अधिक तापमान से कोरोना संक्रमण कम होने का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है।

एक अनार(दाना), सौ बीमार
3.विकसित देशों की तुलना में भारत की तैयारी बेहद चिंताजनक है क्योंकि विगत दशकों के जनस्वास्थ्य सेवाओं  में बेहद कम निवेश- भारत अपनी GDP का केवल 1.3% स्वास्थ्य सेवाओं में खर्च करता है- के कारण भारत की स्वास्थ्य सेवाएँ बेहद खस्ताहाल है। न तो पर्याप्त मात्रा में डॉक्टर हैं, न बिस्तर (बेड) हैं और न ही उपकरण हैं। 130 करोड़ भारतवासियों की गहन चिकित्सा के लिए भारत में लगभग 1 लाख बेड ही उपलब्ध हैं जिसमें हर वर्ष लगभग 50 लाख लोगों का इलाज हो पाता है। साथ ही, चिकित्सा के अल्प-संसाधन ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा बड़े-बड़े शहरों में असमान रुप से वितरित हैं।

भारतीय शरीर की तासीर
4. कोरोना ऐसी बीमारी है जो प्राथमिक रुप से फेफड़ो को संक्रमित करती है। इससे पहले से बीमार चल रहे लोगों की जान को ज्यादा ख़तरा है। ऐसे में देश में फैला व्यापक वायु-प्रदुषण, दवा-प्रतिरोधी TB (टूबरकुलोसिस) और दुनिया के लगभग आधे- 49%- डाईबीटीस (मधुमेह) से ग्रसित लोगों का भारत में पाया जाना हमारे फेफड़ों को कोरोना से अतिसंवेदनशील बना देता है।

एक तरफ़ खाई दूसरी तरफ़ कोरोना
5. गरीबी के कारण ‘सोशल डिस्टन्सिंग’- एक दूसरे से शारीरिक दूरी बनाने- का उपाय भारत में 4 कारणों से सार्थक नहीं हो सकता है: (A) कमाने-खाने के लिए अधिकांश लोगों को घर से बाहर निकलना ही पड़ेगा; (B) अगर जैसे-तैसे वो अपने घरो के अंदर रहते भी हैं तो उनके घर इतने छोटे हैं और एक-एक घर में इतने ज़्यादा लोग रहते हैं कि ‘सोशल डिस्टन्सिंग’ संभव नहीं हो पाएगी; (C) साफ़ पानी से हाथ धोने जैसा सरल उपाय भी इसलिए सफल नहीं हो पाएगा क्योंकि आज भी 16 करोड़ भारतवासियों के पास स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं है; और (D) भारत में छोटे-मोटे सामाजिक कार्यक्रमों में भी सैकड़ो की भीड़ इकट्ठा हो जाना स्वभाविक सी बात है। ऐसे में भारत में सामुदायिक संक्रमण- जिसे संक्रमण-विज्ञान में ‘स्टेज-3’ कहा जाता है- का विकराल रुप धारण कर लेने की संभावना बेहद अधिक है।

उपरोक्त 5 समस्याएँ ऐसी हैं जिनका समाधान दिनों में नहीं बल्कि दशकों में ही किया जा सकता है। भारत के लिए चीन जैसे 4 दिनो में 1000 बिस्तर का अस्पताल निर्माण कर लेना असंभव है।

‘चिंतनीय छत्तीसगढ़’
छत्तीसगढ़ को ही देख लें, तो 2018 की राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रोफ़ायल के अनुसार 2 करोड़ 50 लाख की आबादी वाले प्रदेश के 813 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों, 166 सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों, 12 उप-जिला अस्पतालों और 32 जिला अस्पतालों में कुल 14,354- मतलब 0.05% आबादी के लिए ही- बेड उपलब्ध हैं, जो कि देश में सबसे कम है। 94.3% साँस लेने की मशीनें (वेंटिलेटर), जिनकी कोरोना के इलाज में सबसे अहम भूमिका रहती है, शहरी क्षेत्रों के अस्पतालों में ही उपलब्ध हैं।

ऐसे में अगर 7-10 करोड़ लोगों की जान बचानी है, तो सरकार के पास चिकित्सकीय आधार पर आपातकाल (इमरजेंसी) लागू करते हुए देश में तत्काल ‘टोटल लॉकडाउन’ करने के अलावा कोई दूसरा उपाय नहीं बचता है। ये आज भी सम्भव है।

उम्मीद की किरणें
मायूसी के बादलों के बीच दो उम्मीद की किरणें हैं।

पहली किरण: टोटल लॉकडाउन को सफल बनाने के लिए दो कदम एक साथ उठाने पड़ेंगे। घरों से ग़ैर-आपात स्थिति में बाहर निकलने को दंडनीय अपराध बनाना पड़ेगा- जिसके लिए आपातकाल लागू करना आवश्यक है- और सरकार और समाज को मिलकर, युद्ध स्तर पर, ज़रूरतमंद लोगों के घरों तक खाद्य जैसी आवश्यक सामाग्री पहुंचाने के कार्य में पूरा फ़ोकस करना पड़ेगा ताकि वो बाहर निकलने पर मजबूर न हों। भारत जैसी 2.5 ट्रिल्यन इकॉनमी के लिए दोनों करना संभव है। केरल, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल की सरकारों ने इसके लिए पुख़्ता प्रबंध करना शुरू कर दिया है हालाँकि इन तीन राज्यों की अपेक्षा, छत्तीसगढ़ सरकार अभी तक TV, रेडीओ, सोशल मीडिया, लाउड-स्पीकर और होर्डिंग में ही उपाय करते नज़र आती है मानो माननीय मुख्यमंत्री की फ़ोटो की झलक पाते ही कोरोना भाग खड़ा होगा! 

दूसरी किरण: भले ही विकसित देश दवाइयों की खोज में हमसे आगे हैं लेकिन भारत अकेले दुनिया की 30% जेनेरिक दवाईयों का उत्पादन कर रहा है। मानव जाति के अस्तित्व की रक्षा करने वाले किसी भी खोज या आविष्कार पर पैटेंट लागू करना क्रूरता और मूर्खता होगी क्योंकि ये समस्त मानवता की, न कि किसी की निजी, सम्पत्ति मानी जाएगी। इसलिए कोरोना की वैक्सिन का आविष्कार होते ही उसको पर्याप्त मात्रा में बनाना और लोगों तक पहुंचाना भारत के लिए अन्य राष्ट्रों की अपेक्षा सरल होगा। ऐसे में एक बार फिर, बुद्ध और गांधी का भारत पूरी दुनिया का संकट-मोचक बन सकता है!

भूमिएक्सप्रेस न्यूज छग रायपुर से चैनल हेड व् संपादक भूपेन्द्र लहरे की धमाकेदार खबर

सम्पर्क
मो.9399846726

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